1 March वीरगतिदिवस=क्रान्तिवीरगोपीमोहन साहा


वीरगतिदिवस=क्रान्तिवीरगोपीमोहन साहा

(01.03.1924)

दुष्ट पुलिसअधिकारी टेगार्ट ने बंगाल के क्रान्तिकारी आन्दोलन को भारी नुकसान पहुँचाया।प्रमुख क्रान्तिकारी या तो फाँसी पर चढ़ा दिये गये,या जेलों में सड़ रहे थे।कई को तो कालेपानी भेज दिया।ऐसे समय में बंगाली वीरभूमि में गोपीमोहन साहा एक क्रान्तिवीर का जन्म हुआ,जिसने टेगार्ट से बदला लेने का प्रयास किया।पर उसका यह प्रयास असफल रहा।टेगार्ट को यमलोक भेजने का तह होते ही गोपीमोहन ने निशाना का अभ्यास शुरू कर दिया।वो एक गोली में ही उसका काम तमाम करना चाहता था।उसने टेगार्ट को कई बार देखा,अब वह मौके की तलाश में रहने लगा.02जन.

1924को प्रातःसात बजे का समय था।सर्दी के कारण कोलकाता में भीषण कोहरा था।दूर से किसी को भी पहचानना कठिन था।गोपीमोहन अपनी धुन में टेगार्ट की तलाश में घूम रहा था।चैरंगी रोड और पार्क स्ट्रीट के चैराहे के पास उसने बिल्कुल टेगार्ट जैसा एक आदमी देखा।उसे लगा,वह जिस संकल्प को मन में सँजोये है,उसके पूरा होने का समय आ गया।उसने आव देखा न ताव,आदमी पर गोली चला दी;गोली चूक गयी।वह व्यक्ति गोपीमोहन पर झपटा,गोपी ने दूसरी गोली चलायी।यह गोली उस आदमी के सिर पर लगी।वो मर गया।गोपी ने तीन गोली और चलायी और वहाँ फिर से भाग गया.एक टैक्सी को हाथ दिया;टैक्सी वाला रुका नहीं।तो गोपीमोहन ने उस पर भी गोली चला दी।गोलियों की आवाज और एक अंग्रेज को सड़क पर मरा देख भीड़ ने गोपीमोहन का पीछा शुरू किया।गोपी ने फिर गोलियाँ चलायीं,तीन लोग घायल हुए।अन्ततः वह पकड़ा गया।फिर उसे पता लगा कि उसने जिस अंग्रेज को मारा है,वह टेगार्ट नहीं अपितु उसका हम शक्ल एक व्यापारिक कम्पनी का प्रतिनिधि है।गोपी को बहुत दुख हुआ कि उसके हाथ से एक निरपराध की हत्या हो गयी।कोर्ट में अपना बयान देते समय उसने टेगार्ट को व्यंग्य से कहा कि आप स्वयं को सुरक्षित मान रहे हैं;यह न भूलें कि जो काम मैं नहीं कर सका,उसे मेरा कोई भाई शीघ्र ही पूरा करेगा।उस पर कई आपराधिक धाराएँ लगाई।उसने जज से कहा- कंजूसी क्यों करते हैं,दो-चार धाराएँ और लगा लो. *16फर.1924को उसे फाँसी की सजा सुना दी. सजा सुन उसने गर्व से कहा, ‘‘मेरी कामना है कि मेरे रक्त की प्रत्येक बूँद भारत के हर घर में आजादी के बीज बोये* जब तक जलियाँवाला बाग और चाँदपुर जैसे काण्ड होंगे,तब तक हमारा संघर्ष भी चलेगा।ब्रिटिश शासन को अपने किये का फल अवश्य मिलेगा. *’’एक मार्च,1924 भारत माँ के अमर सपूत गोपीमोहन साहा ने फाँसी के फन्दे को चूम लिया.तब उनका वजन दो किलो बढ़ गया।फाँसी के बाद उसके शव को लेने के लिए गोपी के भाई के साथ नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी जेल गये थे.सादर वंदन.सादर नमन

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