23 March जन्म जयंति मीराबाई


 जन्मजयंती==

कृष्ण प्रेम में दीवानी मीराबाई==    ====(23मार्च1497.98)=======*

भारत का राजस्थान प्रान्त वीरों की खान कहा जाता है;पर इस भूमि को श्रीकृष्ण के प्रेम में अपना तन-मन और राजमहलों के सुखों को खोकर मारने वाली मीराबाई ने भी अपनी चरण रज से पवित्र किया है।हिन्दी साहित्य में रसपूर्ण भजनों को जन्म देने का श्रेय मीरा को ही है।साधुओं की संगत और एकतारा बजाते हुए भजन गाना ही उनकी साधना थी *"मेरे तो गिरधर गोपाल,दूसरो न कोई.." गाकर मीरा ने स्वयं को अमर कर लिया.मीरा का जन्म मेड़ता(राज.)के राव रत्नसिंह के घर 23 मार्च 1497/98को हुआ.परंतु कई जगह उनका जन्म दिवस-वि.सं.1558/ 59माह-आश्विन शुक्ला पूर्णिमा यानि शरदपूर्णिमा (13.10.1497/98)को ही मुख्य माना है.* जब मीरा तीन साल की थी,तब उनके पिता का और दस साल की होने पर माता का देहान्त हो गया।जब मीरा बहुत छोटी थी,तो एक विवाह के अवसर पर उसने अपनी माँ से पूछा कि मेरा पति कौन है ?माता ने हँसी में श्रीकृष्ण की प्रतिमा की ओर इशारा कर कहा कि यही तेरे पति हैं।भोली मीरा ने इसे ही सच मानकर श्रीकृष्ण को अपने मन-मन्दिर में बैठा लिया।माता और पिता की छत्रछाया सिर पर से उठ जाने के बाद मीरा अपने दादा राव दूदाजी के पास रहने लगीं।उनकी आयु की बालिकाएँ जब खेलती थीं,तब मीरा श्रीकृष्ण की प्रतिमा के सम्मुख बैठी उनसे बात करती रहती थी।कुछ समय बाद उसके दादा जी भी स्वर्गवासी हो गये।अब राव वीरमदेव गद्दी पर बैठे।उन्होंने मीरा का विवाह चित्तौड़ के प्रतापी राजा राणा साँगा के बड़े पुत्र भोजराज से कर दिया।इस प्रकार मीरा ससुराल आ गयी;पर अपने साथ वह अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण की प्रतिमा लाना नहीं भूली।मीरा की श्रीकृष्ण भक्ति और वैवाहिक जीवन सुखपूर्वक बीत रहा था।राजा भोज भी प्रसन्न थे;पर दुर्भाग्यवश विवाह के दस साल बाद राजा भोजराज का देहान्त हो गया।अब तो मीरा पूरी तरह श्रीकृष्ण को समर्पित हो गयीं।उनकी भक्ति की चर्चा सर्वत्र फैल गयी।दूर-दूर से लोग उनके दर्शन को आने लगे।पैरों में घुँघरू बाँध कर नाचते हुए मीरा प्रायः अपनी सुधबुध खो देती थीं।मीरा की सास,ननद और राणा विक्रमाजीत को यह पसन्द नहीं था।राज-परिवार की पुत्रवधू इस प्रकार बेसुध होकर आम लोगों के बीच नाचे और गाये,यह उनकी प्रतिष्ठा के विरुद्ध था। उन्होंने मीरा को समझाने का प्रयास किया;पर वह तो सांसारिक मान- सम्मान से ऊपर उठ चुकी थीं।उनकी गतिविधियों में कोई अन्तर नहीं आया। अन्ततःराणा ने उनके लिए विष का प्याला श्रीकृष्ण का प्रसाद कह कर भेजा।मीरा ने उसे पी लिया;पर सब हैरान रह गये,जब उसका मीरा पर कुछ असर नहीं हुआ।राणा का क्रोध और बढ़ गया।उन्होंने एक काला नाग पिटारी में रखकर मीरा के पास भेजा;पर वह नाग भी फूलों की माला बन गया।अब मीरा समझ गयी कि उन्हें मेवाड़ छोड़ देना चाहिए। अतःवह पहले मथुरा- वृन्दावन और फिर द्वारका आ गयीं।इसके बाद चित्तौड़ पर अनेक विपत्तियाँ आयीं।राणा के हाथ से राजपाट निकल गया और युद्ध में उनकी मृत्यु हो गयी।यह देखकर *मेवाड़ के लोग उन्हें वापस लाने के लिए द्वारका गये।मीरा आना तो नहीं चाहती थी;पर जनता का आग्रह वे टाल नहीं सकीं।वे विदा लेने के लिए रणछोड़ मन्दिर में गयीं;पर पूजा में वे इतनी तल्लीन हो गयीं कि वहीं उनका शरीर छूट गया।इस प्रकार 1547-48में(वि.सं.1604 -05)द्वारका में ही श्रीकृष्ण की दीवानी मीरा ने अपनी देहलीला समाप्त की.सादर वंदन.सादर नमन.

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