27 Feb जन्मदिन =महानसंत चैतन्य महाप्रभु

जन्मदिवस आंग्ल दिनांक-27.02. 1485/86 =संकीर्तन द्वारा धर्म बचाने वाले=


 =महानसंत चैतन्य महाप्रभु =======                                              चैतन्य महाप्रभु का जन्म वि.सं.1542फागुन पूर्णिमा 27फर.1486को बंगाल के प्रसिद्ध शिक्षा-केन्द्र नदिया (नवद्वीप)में हुआ* पिता पं.जगन्नाथ मिश्र,माता शची देवी थीं।बालपन से ही नीम के नीचे वे कृष्णलीला करते रहते थे।अत:नाम निमाई हुआ।मृत्यु बाद इसी पेड़ की लकड़ी से इनकी मूर्ति बनाके स्थापित की।एक बार बाग में खेलते समय एक नाग आया. निमाई ने श्रीकृष्ण की तरह उसके मस्तक पर अपना पैर रख दिया।बच्चे शोर कर घर भागे।माँ ने देखा-घबरा गयीं; थोड़ी देर में नाग चला गया।फिर लोग इन्हें चमत्कारी बालक मानने लगे.16वर्ष की आयु में प्रसिद्ध विद्वान् वासुदेव सार्वभौम के पास जाकर न्यायशास्त्र का अध्ययन कर नदिया में अपनी पाठशाला स्थापित की।उनके शिक्षण की सर्वत्र चर्चा होने लगी।इनकी शादी-

सूरदास के गुरु श्री वल्लभ आचार्य की पुत्री लक्ष्मी से हुई,कुछ समय बाद ही सर्पदंश से वह चल बसी।सबके आग्रह पर उन्होंने विष्णुप्रिया से पुनर्विवाह किया।पिता के देहान्त बाद श्राद्ध करने वे गया गये।वहाँ उनकी भेंट स्वामी ईश्वरपुरी से हुई।और जीवन बदल गया।वे दिन रात श्रीकृष्ण- भक्ति में लीन हो गये।स्कूल बंद की.24वर्ष की आयु में मकर संक्रान्ति पर स्वामी केशवानन्द भारती से संन्यास की दीक्षा ले ली।उन्हेंश्रीकृष्ण चैतन्य नाम दिया।फिर लोग उन्हें चैतन्य महाप्रभु कहने लगे।अब वे कुछ भक्तों के साथ वृन्दावन की ओर निकले।वहाँ उनकी भेंट बंगाल के ही एक युवा संन्यासी निताई से हुई।चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आन्दोलन में निताई का विशेष योगदान रहा।निताई के बाद अद्वैत, नित्यानन्द,हरिदास,श्रीधर, मुरारी,मुकुन्द,श्रीवास आदि भक्त इनके साथ जुड़ गये।इनके संकीर्तन से भक्ति की धूम मच गयी।जहाँ भी वे जाते,लोग कीर्तन करते हुए इनके पीछे चल देते।उन दिनों बंगाल में मुस्लिम नवाबों का बहुत आतंक था;पर इनके प्रभाव से अनेक का स्वभाव बदल गया।अब निमाई को लगा कि प्रभुनाम के प्रचार के लिए घर छोड़ना होगा।वे जगन्नाथपुरी जाकर रहने लगे ।वे कीर्तन एवं भक्ति के आवेश में बेसुध हो जाते। फिर वे यात्रा पर निकले। इनके कीर्तन से सुप्त और भयभीत हिन्दुओं में चेतना आयी।धर्म छोड़ने जा रहे लोग रुक गये।दो वर्ष तक दक्षिण और पश्चिम के तीर्थों की यात्रा कर वे फिर पुरी आ गये *वि.सं.1590की आषाढ़ सप्तमी के दिन ये जगन्नाथ मन्दिर में भक्ति के आवेश में मूर्ति से लिपट गये।कहते हैं कि इनके अन्दर जाते ही मन्दिर के द्वार स्वयमेव बन्द हो गये। बाद में द्वार खोलने पर वहाँ कोई नहीं मिला।ये मूर्ति में ही समाहित हो गये।कुछ कहते हैं कि वे ध्यानावेश अवस्था में समुद्र में समा गये.सादर वंदन.सादर नमन🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏*

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