28 Feb वीरगतिदिवस=सम्बलपुर का क्रांतिवीर सुरेंद्रसाय


वीरगतिदिवस=सम्बलपुर का क्रांतिवीर सुरेंद्रसाय=     =========(28.2.1884)=======                                          सुरेन्द्र साय का जन्म ग्राम खिण्डा सम्बलपुर.उड़ीसा में23जन.1809को हुआ.* उनका विवाह हटीबाड़ी के जमींदार की पुत्री से हुआ,जो गंगापुर राज्य के प्रमुख थे।सुरेन्द्र के घर में एक पुत्र मित्रभानु और एक पुत्री ने जन्म लिया.1827में सम्बलपुर राजा का निःसन्तान देहान्त हो गया।राजगद्दी पर अब सुरेन्द्र साय का हक था;अंग्रेज जानते थे कि सुरेन्द्र उनका हस्तक बन कर नहीं रहेगा।अंत: राजा की पत्नी मोहन कुमारी को ही राज्य का प्रशासक बना दिया।मोहन कुमारी सरल महिला थीं।राजकाज की जानकारी नहीं थी।अंग्रेज कठपुतली की तरह उँगलियों पर नचाने लगे।अंग्रेजों की इस धूर्तता से सब जमींदार नाराज हो गये।सभी मिल इसका सशस्त्र विरोध करने का निश्चय किया।इस हेतु  उन्होंने सुरेन्द्र साय को नेता बनाया।संघर्ष एवं प्रतिरोध की गति बढ़ने लगी,तो अंग्रेज अधिकारी परेशान हो गये.1837में सुरेन्द्र साय, उदन्तसाय,बलराम सिंह, लखनपुर के जमींदार बलभद्र सब मिल डेब्रीगढ़ में कुछ विचार-विमर्श कर रहे थे- अंग्रेजों ने वहाँ धावा बोल दिया।बलभद्र की हत्या कर दी;शेष तीनों बचने में सफल हो गये।इनकी गतिविधियाँ चलती रहीं।अंग्रेज भी पीछे लगे रहे।जासूस भी लगा रखे थे।ऐसे ही देशद्रोहियों की सूचना पर-1840में सुरेन्द्र साय,उदन्तसाय,बलराम सिंह अंग्रेजों की गिरफ्त में आ गये ।तीनों को आजन्म कारावास का दण्ड देकर हजारीबाग जेल में डाला।इनके साथी शान्त नहीं बैठे.30जुलाई 1857को सैकड़ों क्रान्तिवीरों ने हजारीबाग जेल पर धावा बोल-सुरेन्द्र साय को 32 साथियों सहित छुड़ा कर ले गये।सुरेन्द्रसाय ने सम्बलपुर पहुँचकर फिर से अपने राज्य को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए सशस्त्र संग्राम शुरू कर दिया।अंग्रेज पुलिस और सुरेन्द्र के सैनिकों में झड़प होती रहती थी।कभी एक का पलड़ा भारी रहता,तो कभी दूसरे का;सुरेन्द्र और साथियों ने अंग्रेजों को चैन से नहीं सोने दिया.23जन.1864 को जब सुरेन्द्रसाय परिवार के साथ सो रहे थे,तब अंग्रेज पुलिस ने छापा मार उन्हें पकड़ लिया।रात में ही सपरिवार रायपुर ले गये।फिर नागपुर असीरगढ़ जेल में बन्द कर दिया।जेल में शारीरिक मानसिक उत्पीड़न के बाद भी सुरेन्द्र ने विदेशी शासन के आगे झुकना नहीं स्वीकारा *अपने जीवन के 37साल जेल में बिताने वाले उस वीर ने 28फर.1884को"असीरगढ़ जेल" में ही अन्तिम साँस ली. सादर वंदन.सादर नमन

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