महादजी शिंदे (या, महादजी सिंधिया ; १७३० -- १७९४) मराठा साम्राज्य के एक शासक थे जिन्होंने ग्वालियर पर शासन किया। वे सरदार राणोजी राव शिंदे के पाँचवे तथा अन्तिम पुत्र थे।
ऐतिहासिक स्मरणीय दिवस 31मार्च का दिन अंग्रेजियत से आजादी के लिए मिल रहें है शुभ संकेत========== =1857की क्रांति के लिए 31.03.1857निश्चित=== किया गया था* हालाकि वह क्रांति इस तिथी से पहले ही शुरू हो गई थी.1857की क्रांति में अनेको शूरवीर शहीद हो गए पर एक स्वतंत्रता की आशा की किरण दिखा गए।उस क्रांति के परिणामस्वरूप अंग्रेजों का शासन हिल गया था *और भारत से ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राज तो समाप्त हो गया पर इंग्लेंड की सरकार ने शासन.सम्हाल.लिया.* और1947में अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए। पर अंग्रेजियत अभी भी हमको गुलाम बनाये हुए है.अब अंग्रेजियत से आजादी का सही समय आ गया.आप पूछेगें कि अब सही समय क्यों? उसका उत्तर है कि *जब अस्तित्व को कोई परिवर्तन करना होता है तो वह कोई न कोई संकेत जरुर देता है.1857की क्रांति के लिए निश्चित की तारिख-31मार्च ही थी.वंदन.अभिनंदन🙏
वीरगतिदिवस= (1)29.03.1917को यानि आज ही के दिन महान क्रातिवीर पुत्र सरदार बलवंतसिंह सहित पांच क्रातिवीर पुत्रों ने देश की आजादी के लियें अपने प्रणों की आहुति दे दी. अत:आज उन क्रांतिवीरों की शहादत का दिन है।सादर वन्दन.सादर नमन. (2)आज ही के दिन यानि 29.03.1857को महान क्रातिवीर पुत्र मंगल पाण्डे ने बेरकपुर छावनी मे अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया।इसके इनाम मे उन्हें 08.04.1857को(10दिन पूर्व18.04.की बजाय)को फांसी दे दी गयी।ऐसे क्रांतिवीर पुत्र मंगल पाण्डे को सादर वंदन.सादर नमन🕉🌹🙏🌹🕉🙏🌹🕉🙏🌹🕉🙏*
शहीदों को प्रणाम स्मरणीय दिवस-शहीद दिवस 23मार्च1931की मध्यरात्रि को अंग्रेज़ी शासन ने भारत के तीन सपूतों- भगतसिंह,सुखदेव,राजगुरु को फाँसी पर लटका दिया. शहीद दिवस के रूप में जाना जाने वाला यह दिन यूं तो भारतीय के लिए काला दिन माना जाता है, पर आजादी की लड़ाई में खुद को देश की वेदी पर चढ़ाने वाले ये नायक हमारे आदर्श हैं।इन तीनों वीरों की शहादत को श्रद्धांजलि देने हेतु यह शहीद दिवस मनाया जाता है।जबकि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की याद में भी शहीद दिवस मनाया जाता है.30जन.1948को सत्य अहिंसा के पुजारी गांधीजी की पुण्यतिथि पर"शहीद दिवस"मना उन्हें भी श्रद्धांजलि दी जाती है।* भारत एक महान् देश है।यह उन वीरों की कर्मभूमि भी रही है,जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना इस देश के लिए कार्य किए।अपने वतन के लिए प्राणों की बलि देने से भी हमारे वीर कभी पीछे नहीं हटे।देश को स्वतंत्र कराने हेतु देश के वीरों ने अपनी जान की आहुति तक दी। *अदालती आदेशानुसार भगतसिंह, राजगुरु सुखदेव को 24 मार्च 1931को फाँसी लगाई जानी थी,सुबह 8बजे फांसी लगाई जानी थी,लेकिन 23मार्च 1931 को ही इन तीनों को शाम सात...
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