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लकानगिरी का गाँधी’ जिससे डरकर, अंग्रेज़ों ने उन्हें दे दी थी फाँसी!


लक्ष्मण नायक दक्षिण उड़ीसा में आदिवासियों के अधिकारों के लिए कार्यरत थे। उनका जन्म 22 नवंबर 1899 को कोरापुट में मलकानगिरी के तेंटुलिगुमा में हुआ था। अंग्रेजी सरकार की बढ़ती दमनकारी नीतियाँ जब भारत के जंगलों तक भी पहुँच गयी और जंगल के दावेदारों से ही उन की संपत्ति पर लगान वसूला जाने लगा तो नायक ने अपने लोगों को एकजुट करने का अभियान शुरू कर दिया।


ब्रिटिश सरकार ने उनके बढ़ते प्रभाव को देख, उन्हें एक झूठे हत्या के आरोप में फंसा दिया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और फाँसी की सजा सुनाई गयी। 29 मार्च 1943 को बेरहमपुर जेल में उन्हें फाँसी दे दी गयी। अपने अंतिम समय में उन्होंने बस इतना ही कहा था,


“यदि सूर्य सत्य है, और चंद्रमा भी है, तो यह भी उतना ही सच है कि भारत भी स्वतंत्र होगा।”

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